अर्थव्यवस्था के रंग निराले,
जीवन के हर मोड़ संभाले।
कहीं नियम तो कहीं आज़ादी,
इसी से दुनिया चलती सारी।।
(कोरस – छात्र दोहराएँ)
चलती सारी… चलती सारी…
इसी से दुनिया चलती सारी…।।
🎶 अंतरा 1: (प्रकार – दमदार शैली)
कहीं पूंजी का राज निराला,
लाभ-हानि का खेल निराला।
मुक्त बाजार की खुली उड़ान,
मांग-आपूर्ति जिसकी पहचान।।
कहीं श्रमिक का ऊँचा नारा,
समता का है दृढ़ सितारा।
राज्य संभाले हर संसाधन,
सबके हित का एक ही साधन।।
🎵 ब्रिज (तेज़ लय) दोनों धारा जब टकराती,
नई दिशा फिर जन्म है पाती…।।
🎤 मुखड़ा (दोहराव)
अर्थव्यवस्था के रंग निराले…
जीवन के हर मोड़ संभाले…।।
🎶 अंतरा 2: (मिश्रित अर्थव्यवस्था + भारत)
मिश्रित राह का दीप जलाया,
भारत ने संतुलन अपनाया।
सरकार और निजी संग-साथ,
विकास बढ़े हर एक के साथ।।
कृषि, उद्योग, सेवा का मेल,
तीनों मिलकर रचते खेल।
गांव-शहर का संगम प्यारा,
यही विकास का सच्चा सहारा।।
🎶 अंतरा 3: (आधुनिक भारत – प्रेरक)
डिजिटल युग में बढ़ते कदम,
नवाचार से जुड़ता हर दम।
स्टार्टअप की नई उड़ान,
युवा शक्ति की नई पहचान।।
आत्मनिर्भरता का है नारा,
विश्व में गूंजे भारत सारा।
परंपरा संग प्रगति की चाल,
यही अर्थव्यवस्था का कमाल।।
🎤 अंतिम मुखड़ा (Grand Finale)
अर्थव्यवस्था के रंग निराले,
जीवन के हर मोड़ संभाले।
मिश्रित राह पर बढ़ता भारत,
विकास गीत अब गाए भारत।।
(कोरस – ऊँची आवाज़ में)
गाए भारत… गाए भारत…
विकास गीत अब गाए भारत…।।
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